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04 मार्च 2011

देखें धर्म ग्रंथों को ... 1.2

हम जब भी इस सृष्टि के के बारे में सोचते हैं तो , हमारे जहन में कई तरह के प्रश्न उभर कर आते हैं , लेकिन हमें उनका समाधान तार्किक दृष्टिकोण से नहीं मिलता . उनका समाधान पाने के लिए हमें सांसारिक मोह माया से उपर उठकर विचार करना होता है .और यह विचार बुद्धि से न होकर मन को साधते हुए आत्मा को परमात्मा में लीन करते हुए करना होता है . लेकिन इंसान पर माया का प्रभाव इतना होता है कि वह अपने जीवन में बहुत कम आत्मिक स्तर पर सोचता है . जब वह आत्मिक स्तर पर सोचना शुरू करता है तो उसके जीवन में आलौकिक आनंद का अहसास होता है . जैसे- जैसे हम अपने आपको इस संसार से उपर उठाते हैं तो हमें परमानन्द की अनुभूति होती है . और इस परमानन्द की अनुभूति को फिर जन जन तक पहुँचाने के लिए हमारे ऋषि , संत काव्य का सहारा लेते आये हैं .

वेदों से लेकर आज तक किसी न किसी रूप में हमें यह अभिव्यक्ति देखने पढने और सुनने को मिली है . 'अवतार वाणी' भी बाबा "अवतार सिंह जी " द्वारा इस परमात्मा को अनुभूत करने के बाद रची गयी है इसके पहले पद्य में ही जिस शब्द का प्रयोग हुआ है वह इसकी सार्थकता और ईश्वर के होने का बोध करवाता है :-
अवतार वाणी का प्रारंभ कुछ इस तरह से होता है
इक तूं ही निरंकार
इस पंक्ति को अगर हम देखें तो यह बहुत गहरे अर्थ हमारे सामने लाती है , बेशर्त है कि हमें इस अर्थ को समझने के लिए भावनात्मक रूप से ईश्वर के साथ जुड़ना होता है अब हम इस पंक्ति को देखते है यहाँ जो शब्द आये है :-
इक = पूरी सृष्टि में एक ही परमात्मा है .
तूं = तूं शब्द का प्रयोग हम तब करते हैं जब कोई हमारे सामने होता है , और वह हमें बहुत प्रिय होता है इसी तरह का शब्द गुरुवाणी में भी प्रयोग किया गया है
मैं मछली तूं दरियावा , तूं मेंरा दाना बीनायहाँ पर किया गया "तूं "शब्द का प्रयोग भी इस ईश्वर के पास होने का अहसास करवाता है .
निरंकार = "निरंकार" शब्द का होना हमें परमात्मा के उस सवरूप का बोध करवाता है जो उसके सृष्टि के कण कण में व्याप्त होने कि प्रमाणिकता को सिद्ध करता है . क्योँकि यह सच है कि जब किसी वास्तु का आकार होता है तो उसकी सीमा तय हो जाती है . और अगर परमात्मा का कोई आकर होता तो उसकी भी एक सीमा होती और ऐसी सीमा परमात्मा को कभी भी सर्वव्यापक होने का प्रमाण नहीं देती . गुरु वाणी का प्रारंभ भी "ओंकार" शब्द से होता है . इक ओंकार सतनाम = अर्थात एक निरंकार है जिसका नाम सत्य है ओंकार शब्द से ही निरंकार शब्द की उत्पति हुई है .समग्रतः कहा जा सकता है कि परमात्मा निराकार है .
जारी .....!