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11 नवंबर 2011

देखें धर्म ग्रंथों को...1.4

परमात्मा इस सृष्टि के कण कण में विद्यमान है और इसे सिर्फ गुरु की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है. इसका स्वरूप निराकार है और यह स्वयं बना है सारी सृष्टि इसमें समाई है और यह सृष्टि में समाया है. सारे जगत का कर्ता धर्ता यह परमात्मा है.जब गहराई से विचारते हैं तो हम वास्तविकता से अवगत होते हैं. वर्ना हम अज्ञानता में ही अपना जीवन गवां देते हैं. जीवन का मतलब तो वैकुण्ठ को प्राप्त करना है, मोक्ष हासिल करना है और यह सब तब ही हासिल होता है जब हमें गुरु की कृपा से परमात्मा के दर्शन होते हैं, और तब भक्त कहता है "सीस दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान" ऐसा गुरु जो जिज्ञासु की जिज्ञासा को शांत कर दे. उसे मुक्ति मार्ग पर डाल दे उसे उसके जीवन का लक्ष्य समझा दे. तो फिर भक्त के लिए गुरु और ईश्वर में कोई भेद नहीं. वह फिर कबीर की तरह कहता है :-  

                                 गुरु गोबिंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय 
                                 बलिहारी गुरु आपने, जिन गोबिंद दियो मिलाय. 
गोबिंद से मिलाने के कारण गुरु ‘साक्षात पारब्रह्म’ हो गया. गुरु माध्यम बन गया आत्मा का मिलन परमात्मा से करवाने का और जीव ने हासिल कर लिया अपने जीवन का लक्ष्य, अब आत्मा और परमात्मा में भेद नहीं और यही भेद न होने के कारण भक्त ईश्वर को सर्वत्र देखता है, उसे अपने अंग-संग महसूस करता है. बाबा अवतार सिंह जी द्वारा रचित अवतार वाणी में इस अहसास को यूँ अभिव्यक्त किया गया है :   

                                  रूप  रंग  ते  रेखों  न्यारेतैनूं  लख  परणाम  करां I
                                  मन  बुद्धि  ते  अकलों  बाहरे,  तैनूं  लख  परणाम  करां I
                                  अनहद  ते  असगाह  स्वामीतैनूं  लख  परणाम  करां I
                                  शाहाँ  दे  हे  वी  शाह  स्वामी,  तैनूं  लख  परणाम  करां I
                                  आद  अनादि  सर्वव्यापी , तैनूं  लख  परणाम  करां I
                                  जुग जुग अन्दर तारे पापीतैनूं  लख परणाम करां  I
                                  सगल  घटं  दे  अन्तर्यामीतैनूं  लख  परणाम  करां I
                                  आपे  नाम  ते  आपे  नामी,  तैनूं  लख परणाम करां I
                                  जीव  जन्त  दे  पालनहारेतैनूं  लख  परणाम  करां
                                  कहे   अवतार हे  प्राण  आधारेतैनूं  लख  परणाम  करां

                                   तेरी  ओट  सहारा  तेरा  तन  मन  घोल  घुमावां I
                                   कहे  अवतार  तेरे  ही  दाता  दिन  रातीं  गुण  गावां I
                                   तेरे  हुक्मों  बाहिरा  चल    सक्के  कोए I
                                   अवतार  कुझ  ना  कर  सके  जो  चाहें  तूं  होए I    
यहाँ स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि परमात्मा जिसे मैंने गुरु कि कृपा से प्राप्त किया है वह कल्पना से बाहर की वस्तु है जिसके विषय में मैंने कभी सोचा ही नहीं. इस परमात्मा सामने महसूस करते हुए वह उसे संबोधित करते हुए कहते हैं ‘कि तुझे मैं लाखों बार प्रणाम करता हूँ, क्योँकि तू रूप रंग और रेखाओं से न्यारा है. जहाँ हम खुदा को किसी स्वरूप में बाँधने की कोशिश करते हैं वहीँ पर अवतार सिंह जी कहते हैं कि यह ईश्वर रूप और रेखाओं से न्यारा है और इसे हमारे मन बुद्धि और अकलों से बाहर है इसे हमारी छोटी सी बुद्धि नहीं समझ सकती, यह अनहद है और इसका कोई पार नहीं पाया जा सकता इसकी थाह लेना बहुत कठिन है. यह शाहों का शाह है. यह आदि काल से यूँ ही है और ना जाने कब तक यूँ ही रहेगा यह कभी समाप्त होने वाला नहीं है और यह परमात्मा सर्वव्यापी है इसलिए मैं इसे नमस्कार करता हूँ. 

इस परमात्मा ने धरती के जीवों पर कृपा की और उन्हें पार उतारा है, कई पापियों को यह युगों-युगों से इस भव (संसार) से पार लगता आया है, यह सर्वव्यापी ईश्वर सभी के दिल की जानने वाला है, तभी तो इसे अन्तर्यामी कह रहा हूँ. यह स्वयं नाम है और स्वयं ही नामी है, इसकी महिमा अवर्णनीय है. इस सृष्टि में पैदा होने वाले प्रत्येक जीव का यह पालक है और सही मायनों में हमारे प्राणों का आधार ही यही है. इसके बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं. मैं तुझे अंग संग महसूस करते हुए तेरा सहारा स्वीकार करता हूँ और तेरे ही गुण मैं दिन रात गाने का वादा करता हूँ क्यूंकि मुझे अब समझ आ गया है कि तेरे हुकम के बगैर कोई भी नहीं चल सकता और मैं कहता हूँ (अवतार) कि वही कुछ होता है जो कुछ तू चाहता है. यहाँ प्रत्येक पंक्ति में तूं और तैनूं शब्द का प्रयोग किया गया है जो जो सीधे संवाद (आत्मा का परमात्मा से) को दर्शाता है. 

वेदांत दर्शन में भी इस साक्षात ईश्वर की महिमा गायी गई है वहां इसे पूरी सृष्टि का कारण कहा गया है ‘एष योनिः सर्वस्य’ (मा० उ ० 6) अर्थात यह परमात्मा सम्पूर्ण जगत का कारण है. यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति I यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति I तद्विजिज्ञासस्व I तद्ब्रह्मेति I (तै ० उ 0 312) यह सब प्रत्यक्ष दीखने वाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं तथा अंत में प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको जानने की इच्छा कर और वही ब्रह्म है. अब जब सृष्टि का आधार ही ब्रह्म है तो उसे जानना आवश्यक है और मानव जीवन का लक्ष्य भी वही है. भगवान् श्रीकृष्ण जब अर्जुन को विराट रूप के बारे में जानकारी देते हैं तो वह भी कहते हैं : नमः पुरस्तादतथ  पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व/ अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः I (गीता 11 /40) अर्जुन कहते हैं : हे अनंत सामर्थ्यों वाले! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार है. हे सर्वात्मन! आपके लिए सब और से ही नमस्कार हो. क्योँकि अनंत पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं अर्थात सब कुछ आप ही हैं.

24 मार्च 2011

देखें धर्म ग्रंथों को....1.3


हम यह मानते हैं कि ईश्वर इस सृष्टि के कण-कण में समाया है, लेकिन ऐसा नहीं है. यह बात सिर्फ कहने को सही लगती है तथा हमें आनंद  देती है या हम यह कह सकते हैं कि हमें भी परमात्मा के विषय में थोड़ी बहुत जानकारी है. सच तो यह है कि यह सृष्टि परमात्मा में समायी है. क्योँकि परमात्मा ने इस सृष्टि के रचना की है न कि इस सृष्टि ने परमात्मा की रचना. अब यह कहा जा सकता है कि यह सृष्टि परमात्मा में समायी है और परमात्मा इस सृष्टि को जिस तरह चलाना चाहे चला सकता है जो भी करना चाहे कर सकता है. सब कुछ उसके हाथ में है. अवतार वाणी का प्रारंभ इक तूं ही निरंकार से होता है और इसका पहला पद्य परमात्मा को समर्पित है. बाबा अवतार सिंह ने सिर्फ यह पद्य अपने हाथ से लिखा है. बाकी 375 पद्य उनके परम शिष्य ने कलम बद्ध किये हैं. अवतार वाणी का प्रारंभिक पद्य यूँ है :---

                                      परम पिता परमात्मा कण कण तेरा वास. 
                                      करण करावण  हार तूं सब कुझ तेरे पास. 
                                      अंग संग तैनूं वेख के अवतार करे अरदास. 
                                      तू शाहां दा शहनशाह मैं दासां दा दास.
हे परम पिता परमात्मा यह जो सृष्टि है इसके कण कण में तेरा वास है और इस सृष्टि में जो कुछ भी हो रहा है सब कुछ करने और करवाने वाला तूं ही है जितना भी इस सृष्टि का फैलाब है तू उसमें समाया है समाया है और जो कुछ भी इस सृष्टि में है सब कुछ तेरे पास है. मैं  तुझे तुझे अंग संग देख कर तेरे सामने प्रार्थना  करता हूँ कि तू तो शाहों का शहनशाह है और में दासों का दास हूँ. यहाँ पर बाबा अवतार जी सिंह ने अंग संग शब्द का प्रयोग किया है, हालाँकि परमात्मा आकर रहित है लेकिन जब कोई संत इसे पा लेता है तो इसके अस्तित्व को निराकार होते भी साकार रूप में अपने साथ  महसूस करता है इसलिए उसे यह परमात्मा अपने साथ -साथ नजर आता है और यही ज्ञान दृष्टि है. इसे पाना ही जीव की सार्थकता है. गीता में भगवान श्रीकृष्ण इस विषय में अर्जुन  को समझाते हुए कहते हैं कि :---
                                     क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत. 
                                     क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तजज्ञानं मतं मम.
हे भारतवंशी ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि इस सृष्टि में जितने भी जीव है सबके शरीरों का ज्ञाता मैं ही हूँ, और इस विषय का ज्ञान रखना आवश्यक है. इस शरीर  तथा इसके ज्ञाता को जान लेना ज्ञान कहलाता है. ऐसा मेरा मत है. भगवान श्री कृष्ण जी भी अपने मत में इस सृष्टि का कर्ता धर्ता इस परमात्मा को स्वीकार करते हैं. और परमात्मा स्वयं कहते हैं कि ‘मैं प्रत्येक शरीर के कर्म क्षेत्र का ज्ञाता हूँ’ इस सृष्टि में जितने भी जीव हैं सबका आधार में ही हूँ, जितना भी इस सृष्टि का पसारा है में ही सर्वत्र हूँ. इस सृष्टि में जितने भी कर्म किये जा रहें हैं सबका संचालन मेरे द्वारा किया जा रहा है.  इससे यह जाहिर होता है कि ईश्वर समस्त जगत में रहने वाले जीवों और उनके कर्म के विषय में जानता  है और सबसे सब कुछ करवाने वाला यह परमात्मा है.
जपुजी साहिब में गुरु नानक देव जी  भी इस परमात्मा के विषय में बात करते हुए कहते हैं कि यह परमात्मा कैसा है तथा इसका बिस्तार  कितना है :--
                                     इक ओंकार सतिनाम 
                                     कर्ता पुरख निरभउ निरवैर.
                                     अकाल मुरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि.. 
यह परमात्मा एक है और इसका स्वरूप निराकार है और इसका नाम  "सत" यानी सत्य है. यह परमात्मा कर्ता पुरुष है, वैर से रहित है, काल से परे है, न जन्मता है न मरता है और यह स्वयंभू है. लेकिन इसे गुरु  की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है, और आगे फरमाते हैं कि:--
                                     आपे करता पुरखु बिधाता. जिनि आपे आपि उपाइ पछाता.
                                     आपे सतिगुरु आपे सेवकु आपे सृष्टि उपाई हे.
यह आपने आप बिधाता है इस सृष्टि को उत्पन्न करने के बाद इसने खुद को इसमें छुपा लिया है और यह परमात्मा खुद ही सतगुरु है खुद ही सेवक है. यह सब कुछ करता है और फिर भी कर्म रहित है. परमात्मा इस सृष्टि के कण कण में विद्यमान है और इसे सिर्फ गुरु की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है. इसका स्वरूप निराकार है और यह स्वयं बना है सारी सृष्टि इसमें समाई है और यह सृष्टि में समाया है. सारे जगत का कर्ता धर्ता यह परमात्मा है.

04 मार्च 2011

देखें धर्म ग्रंथों को ... 1.2

हम जब भी इस सृष्टि के के बारे में सोचते हैं तो , हमारे जहन में कई तरह के प्रश्न उभर कर आते हैं , लेकिन हमें उनका समाधान तार्किक दृष्टिकोण से नहीं मिलता . उनका समाधान पाने के लिए हमें सांसारिक मोह माया से उपर उठकर विचार करना होता है .और यह विचार बुद्धि से न होकर मन को साधते हुए आत्मा को परमात्मा में लीन करते हुए करना होता है . लेकिन इंसान पर माया का प्रभाव इतना होता है कि वह अपने जीवन में बहुत कम आत्मिक स्तर पर सोचता है . जब वह आत्मिक स्तर पर सोचना शुरू करता है तो उसके जीवन में आलौकिक आनंद का अहसास होता है . जैसे- जैसे हम अपने आपको इस संसार से उपर उठाते हैं तो हमें परमानन्द की अनुभूति होती है . और इस परमानन्द की अनुभूति को फिर जन जन तक पहुँचाने के लिए हमारे ऋषि , संत काव्य का सहारा लेते आये हैं .

वेदों से लेकर आज तक किसी न किसी रूप में हमें यह अभिव्यक्ति देखने पढने और सुनने को मिली है . 'अवतार वाणी' भी बाबा "अवतार सिंह जी " द्वारा इस परमात्मा को अनुभूत करने के बाद रची गयी है इसके पहले पद्य में ही जिस शब्द का प्रयोग हुआ है वह इसकी सार्थकता और ईश्वर के होने का बोध करवाता है :-
अवतार वाणी का प्रारंभ कुछ इस तरह से होता है
इक तूं ही निरंकार
इस पंक्ति को अगर हम देखें तो यह बहुत गहरे अर्थ हमारे सामने लाती है , बेशर्त है कि हमें इस अर्थ को समझने के लिए भावनात्मक रूप से ईश्वर के साथ जुड़ना होता है अब हम इस पंक्ति को देखते है यहाँ जो शब्द आये है :-
इक = पूरी सृष्टि में एक ही परमात्मा है .
तूं = तूं शब्द का प्रयोग हम तब करते हैं जब कोई हमारे सामने होता है , और वह हमें बहुत प्रिय होता है इसी तरह का शब्द गुरुवाणी में भी प्रयोग किया गया है
मैं मछली तूं दरियावा , तूं मेंरा दाना बीनायहाँ पर किया गया "तूं "शब्द का प्रयोग भी इस ईश्वर के पास होने का अहसास करवाता है .
निरंकार = "निरंकार" शब्द का होना हमें परमात्मा के उस सवरूप का बोध करवाता है जो उसके सृष्टि के कण कण में व्याप्त होने कि प्रमाणिकता को सिद्ध करता है . क्योँकि यह सच है कि जब किसी वास्तु का आकार होता है तो उसकी सीमा तय हो जाती है . और अगर परमात्मा का कोई आकर होता तो उसकी भी एक सीमा होती और ऐसी सीमा परमात्मा को कभी भी सर्वव्यापक होने का प्रमाण नहीं देती . गुरु वाणी का प्रारंभ भी "ओंकार" शब्द से होता है . इक ओंकार सतनाम = अर्थात एक निरंकार है जिसका नाम सत्य है ओंकार शब्द से ही निरंकार शब्द की उत्पति हुई है .समग्रतः कहा जा सकता है कि परमात्मा निराकार है .
जारी .....!

10 नवंबर 2010

देखें धर्म ग्रंथों को............केवल राम ...1.1


अवतार वाणी जब प्रकाश में आयी तो इसके प्रकाशन से पूर्व ही यह लोगों में काफी लोकप्रिय हो चुकी थी , प्रारंभ में लोग इसके अच्छे लगने वाले पदों को लिखकर ले जाते थे और उचित समय पर इनका प्रयोग करते थे , जब "अवतार वाणी" का प्रकाशन हुआ तो इसकी हजारों प्रतियाँ हाथों- हाथों बिक गयी और आज तक निरंतर बिक रही हैं । बाबा अवतार सिंह जी के जीवन तथा उनकी वाणी पर शोध कार्य हो चुके हैं । आगे भी होते रहेंगे ..... ।इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद बाबा अवतार सिंह जी कि प्रवल इच्छा थी कि (उनके शब्दों में " मेरी इच्छा है कि एह पुस्तक जिज्ञासु अते प्रभु प्रेमियां नूं निरंकार दे चरना विच ल्याण दा कारण बणे । मनुख वैर - विरोध ते हंकार विच्चों निकल के इस अंग- संग वासी निरंकार नूं हाजर -नाजर वेख के हर पल एहदी टेक लेन्दे होए जीवन सफला करे । और फिर उन्होंने कहा :
                    "गुण गाणे निरंकार दे कहे अवतार ना भूल ।
पर सदके उस अरदास तों जो प्रभ करे कबूल । । "
बाबा अवतार सिंह जी का स्पष्ट मत है कि इस निरंकार प्रभु को गुरु की कृपा से देखा (पहचाना ) जा सकता है । तभी तो वो कहते हैं कि अगर मुझे किसी के गुण गाणे हैं तो इस निरंकार प्रभु के गाणे हैं ,और मुझे ऐसी प्रार्थना करनी है जिसे यह प्रभु कबूल करे
जारी .....!

05 नवंबर 2010

देखें धर्म ग्रंथों को............केवल राम ....1

हम अपने देश के इतिहास पर नजर डालते हैं तो हम पाते हैं कि हमारा जीवन दर्शन हमें "तमसो मां ज्योतिर्गमय" अर्थात अन्धकार से प्रकाश कि और ले जाता है । अन्धकार क्या है , प्रकाश क्या है ? इन विषयों पर हमारे देश " आर्यावर्त" में काफी पहले से विचार किया गया । और हम कुछ निष्कर्षों तक भी पहुँच गए । सृष्टि कि उत्पति का रहस्य क्या रहा है ? जीव क्या है ? जगत क्या है ? माया क्या है ? ब्रह्म क्या है ? आत्मा क्या है ? परमात्मा क्या है ? आदि तमाम अनसुलझे प्रश्नों पर हमारे ऋषि मुनियों ने विचार किया है , उनका अध्ययन काफी हद तक नहीं वल्कि पूरी तरह से हमारा पथ प्रदर्शन करता है , और हमें इस परम तत्व कि तरफ आक्रष्ट करता है ( जिसे हम परमात्मा कि संज्ञा से अभिहित करते हैं ) ।
हम अगर अपने आस पास के वातावरण पर नजर डालते हैं तो हमे महसूस होता है कि जो हमें दिखाई दे रहा है उसके आलावा भी इस सृष्टि में कोई ऐसा तत्व है जो इसका संचालन कर रहा है । जिसे द्वारा यह पूरा ब्रह्माण्ड नियंत्रित किया जा रहा है , और इस सब कि अभिव्यक्ति उन संतों महापुरषों ने कि है जिन्होंने इस परम सता का साक्षात्कार किया , और उनके साक्षात्कार के विवरण हमें धर्म ग्रंथों में मिलते हैं । कुछ ऐसे ही धर्म ग्रंथों में से मैंने चयन किया है
एक ऐसे धर्म ग्रन्थ का जो बीसबी शताब्दी में लिखा गया । सीधी और सरल भाषा में लिखा गया यह ग्रन्थ परम तत्व की जानकारी हमें पूरी तरह से देने में सहायता करता है ।
सम्पूर्ण अवतार बाणी की रचना बाबा अवतार सिंह जी निरंकारी ने की है । बाबा अवतार सिंह जी दुनियाबी शिक्षा के तोर पर अनपढ़ थे ,थोडा बहुत पंजाबी का ज्ञान उन्हें था , "अवतार बाणी" नमक इस ग्रन्थ की सिर्फ चार पंक्तियाँ उन्होंने अपनी लेखनी से लिखी हैं , बाकि इस ग्रन्थ के 375 पद्यों को उनके परम शिष्य पूर्ण प्रकाश "साकी" जी ने लिखा है । पूर्ण प्रकाश साकी जी के शब्दों में " जब बाबा जी किसी पद्य को लिखने के लिए मुझे अपने पास बिठाते थे तो उनके चेहरे पर आलोकिक प्रकाश होता था , आवाज ऐसी कि व्यक्ति मंत्रमुग्ध हो जाता था । और फिर किसी पद्य को कहने के बाद उसका निरिक्षण खुद करते थे " सम्पूर्ण अवतार बाणी दो भागों में प्रकाशित हुई । इसका पहला भाग सन 1957 में लोक कवि सभा द्वारा छापा गया और दूसरा भाग सन 1964 में संत निरंकारी मंडल द्वारा छापा गया । आज यह ग्रन्थ भारत कि लगभग सभी भाषों के आलावा अंग्रेजी , उर्दू आदि भाषाओँ में अनुदित हैं ।
इस बाणी कि उपयोगिता और आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए इसकी भूमिका में लिखा गया है " अज दी वैज्ञानिक दुनिया विच संत निरंकारी मिशन दे बानी बाबा अवतार सिंह जी निरंकारी जितने सादे शब्दां नाल रब्बी रमजां नू आम आदमी तक पहुंचा के जगत दा उद्धार कर रहे हन, एह कोई लुकी छुपी गल नहीं । हजारां आदमी एन्हां चरना चों ज्ञान दी रोशनी प्राप्त करके अपना जीवन सफल कर रहे हन । दिनों दिन निरंकारी संगत दी बध रही गिनती एस गल दा सबूत है कि अज शांति ते अमन दे चाहवान आप जी दी शिक्षा तों किन्ने प्रभावित हो रहे हन । एस लई हर दिल दी तड़प सी कि किसे तरहं पूज्य बाबा जी दे मनोहर वचन दुनियां दे कोने -कोने तक पहुंचाए जाण । सच्चे पातशाह बाबा जी दे शब्द पल -पल चेते रखन बाला सहारा हन जिस दे बगेर दिल बच शांति टिक नहीं सकती । एस लई चुपासियों एह मंग सी कि हजूर दे शब्द किताबी शक्ल विच छापे जाण तां जो हर कोई इन्हां तो लाभ उठा सके ।
जारी .........!