24 मार्च 2011

देखें धर्म ग्रंथों को....1.3


हम यह मानते हैं कि ईश्वर इस सृष्टि के कण-कण में समाया है, लेकिन ऐसा नहीं है. यह बात सिर्फ कहने को सही लगती है तथा हमें आनंद  देती है या हम यह कह सकते हैं कि हमें भी परमात्मा के विषय में थोड़ी बहुत जानकारी है. सच तो यह है कि यह सृष्टि परमात्मा में समायी है. क्योँकि परमात्मा ने इस सृष्टि के रचना की है न कि इस सृष्टि ने परमात्मा की रचना. अब यह कहा जा सकता है कि यह सृष्टि परमात्मा में समायी है और परमात्मा इस सृष्टि को जिस तरह चलाना चाहे चला सकता है जो भी करना चाहे कर सकता है. सब कुछ उसके हाथ में है. अवतार वाणी का प्रारंभ इक तूं ही निरंकार से होता है और इसका पहला पद्य परमात्मा को समर्पित है. बाबा अवतार सिंह ने सिर्फ यह पद्य अपने हाथ से लिखा है. बाकी 375 पद्य उनके परम शिष्य ने कलम बद्ध किये हैं. अवतार वाणी का प्रारंभिक पद्य यूँ है :---

                                      परम पिता परमात्मा कण कण तेरा वास. 
                                      करण करावण  हार तूं सब कुझ तेरे पास. 
                                      अंग संग तैनूं वेख के अवतार करे अरदास. 
                                      तू शाहां दा शहनशाह मैं दासां दा दास.
हे परम पिता परमात्मा यह जो सृष्टि है इसके कण कण में तेरा वास है और इस सृष्टि में जो कुछ भी हो रहा है सब कुछ करने और करवाने वाला तूं ही है जितना भी इस सृष्टि का फैलाब है तू उसमें समाया है समाया है और जो कुछ भी इस सृष्टि में है सब कुछ तेरे पास है. मैं  तुझे तुझे अंग संग देख कर तेरे सामने प्रार्थना  करता हूँ कि तू तो शाहों का शहनशाह है और में दासों का दास हूँ. यहाँ पर बाबा अवतार जी सिंह ने अंग संग शब्द का प्रयोग किया है, हालाँकि परमात्मा आकर रहित है लेकिन जब कोई संत इसे पा लेता है तो इसके अस्तित्व को निराकार होते भी साकार रूप में अपने साथ  महसूस करता है इसलिए उसे यह परमात्मा अपने साथ -साथ नजर आता है और यही ज्ञान दृष्टि है. इसे पाना ही जीव की सार्थकता है. गीता में भगवान श्रीकृष्ण इस विषय में अर्जुन  को समझाते हुए कहते हैं कि :---
                                     क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत. 
                                     क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तजज्ञानं मतं मम.
हे भारतवंशी ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि इस सृष्टि में जितने भी जीव है सबके शरीरों का ज्ञाता मैं ही हूँ, और इस विषय का ज्ञान रखना आवश्यक है. इस शरीर  तथा इसके ज्ञाता को जान लेना ज्ञान कहलाता है. ऐसा मेरा मत है. भगवान श्री कृष्ण जी भी अपने मत में इस सृष्टि का कर्ता धर्ता इस परमात्मा को स्वीकार करते हैं. और परमात्मा स्वयं कहते हैं कि ‘मैं प्रत्येक शरीर के कर्म क्षेत्र का ज्ञाता हूँ’ इस सृष्टि में जितने भी जीव हैं सबका आधार में ही हूँ, जितना भी इस सृष्टि का पसारा है में ही सर्वत्र हूँ. इस सृष्टि में जितने भी कर्म किये जा रहें हैं सबका संचालन मेरे द्वारा किया जा रहा है.  इससे यह जाहिर होता है कि ईश्वर समस्त जगत में रहने वाले जीवों और उनके कर्म के विषय में जानता  है और सबसे सब कुछ करवाने वाला यह परमात्मा है.
जपुजी साहिब में गुरु नानक देव जी  भी इस परमात्मा के विषय में बात करते हुए कहते हैं कि यह परमात्मा कैसा है तथा इसका बिस्तार  कितना है :--
                                     इक ओंकार सतिनाम 
                                     कर्ता पुरख निरभउ निरवैर.
                                     अकाल मुरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि.. 
यह परमात्मा एक है और इसका स्वरूप निराकार है और इसका नाम  "सत" यानी सत्य है. यह परमात्मा कर्ता पुरुष है, वैर से रहित है, काल से परे है, न जन्मता है न मरता है और यह स्वयंभू है. लेकिन इसे गुरु  की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है, और आगे फरमाते हैं कि:--
                                     आपे करता पुरखु बिधाता. जिनि आपे आपि उपाइ पछाता.
                                     आपे सतिगुरु आपे सेवकु आपे सृष्टि उपाई हे.
यह आपने आप बिधाता है इस सृष्टि को उत्पन्न करने के बाद इसने खुद को इसमें छुपा लिया है और यह परमात्मा खुद ही सतगुरु है खुद ही सेवक है. यह सब कुछ करता है और फिर भी कर्म रहित है. परमात्मा इस सृष्टि के कण कण में विद्यमान है और इसे सिर्फ गुरु की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है. इसका स्वरूप निराकार है और यह स्वयं बना है सारी सृष्टि इसमें समाई है और यह सृष्टि में समाया है. सारे जगत का कर्ता धर्ता यह परमात्मा है.

44 आपकी टिप्पणियाँ:

सुज्ञ ने कहा…

परम पिता परमात्मा कण कण तेरा वास

Rakesh Kumar ने कहा…

मन्नाथ: श्रीजगन्नाथ: मद्गुरू: श्रीजगद्गुरू:
मदात्मा सर्वभूतात्मा ,तस्मै श्री गुरवे नम:

गुरु की कृपा से जब मन की आँखे खुलती हैं तभी परमात्मा का असल स्वरुप समझ आता हैं. परमात्मा गुरु रूप में सर्वत्र मौजूद हैं.आवश्यकता है तो हमें शिष्य रूप में अपने को प्रतिष्ठित करने की ,सीखने की उत्कट अभिलाषा से.
अत्यंत सुन्दर अभिलेख प्रस्तुत किया है आपने.
बहुत बहुत बधाई.

संजय भास्कर ने कहा…

केवल जी
बेहतरीन लेख़ ईश्वर सर्व व्यापक है इसकी सत्ता सृष्टि के कण कण में विद्यमान है

ZEAL ने कहा…

ईश्वर ही वो सर्वशक्तिमान शक्तिपुंज है जो पूरी सृष्टि का सञ्चालन कर रहा है । तृण-तृण में उसका निवास है । उसकी मर्ज़ी से एक पत्ता भी नहीं हिल सकता ।

ZEAL ने कहा…

उसकी मर्जी के बगैर **- [correction]

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

आदरणीय केवल जी
परम पिता परमात्मा घट-घट के वासी हैं और परमात्मा सबके हृदय में निवास करते हैं!

sandhya ने कहा…

परमात्मा इस सृष्टि के कण कण में विद्यमान है और इसे सिर्फ गुरु की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है . इसका स्वरूप निराकार है और यह स्वयं बना है सारी सृष्टि इसमें समाई है और यह सृष्टि में समाया है . सारे जगत का कर्ता धर्ता यह परमात्मा है ...

सारगर्भित और अत्यंत सुन्दर लेख.. ईश्वर तो है ही सर्वव्याप्त, पर उसे पाने का मार्ग गुरु ही दिखा सकते हैं..आवश्यकता है एक अच्छा शिष्य बनकर पहले गुरुकृपा और फिर उनके माध्यम से ईश्वर प्राप्ति के पयत्न की... कहा भी गया है :
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े,काके लागूं पाय
बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो बताय...

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

ईश्वर इस सृष्टि के कण - कण में समाया है .....सारे जगत का कर्ता धर्ता यह परमात्मा है .

सटीक बात...सुंदर विचार।
गहन चिन्तन के लिए बधाई।

रंगपंचमी की आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएँ...

Atul Shrivastava ने कहा…

ईश्‍वर की सर्वव्‍यापकता से कौन इंकार कर सकता है।
यह ईश्‍वर की ताकत ही है कि हम किसी पत्‍थर को भी यदि सिंदूरी रंग से रंग दें तो उसकी पूजा शुरू हो जाती है।
आपने भगवान की सर्वव्‍यापकता को बहुत ही अच्‍छे तरीके से प्रस्‍तुत किया।
शुभकामनाएं आपको।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बिल्कुल सही .....वही सर्वशक्तिमान और वही सर्वव्यापी है..... सार्थक विचार

विशाल ने कहा…

केवल जी,आपने ईश्वर की सर्व व्यापकता और गुरु की महत्ता को ख़ूबसूरती से पिरोया है आलेख में.
सद गुरु की कृपा बिना ईश्वर की सर्व व्यापकता को समझा नहीं जा सकता .
"वासुदेव: सर्वम" को सार्थक करते आपके आलेख के लिए आभार.
अगली पोस्ट का इंतज़ार रहेगा.

राज भाटिय़ा ने कहा…

सहमत हे जी आप की बात से.

ज्योति सिंह ने कहा…

परम पिता परमात्मा कण कण तेरा वास .
करण करावण हार तूं सब कुझ तेरे पास .
अंग संग तैनूं वेख के अवतार करे अरदास .
तू शाहां दा शहनशाह मैं दासां दा दास .
bahut hi umda post ,shanti shanti hi ho ......

एस.एम.मासूम ने कहा…

अच्छा लिख रहे हैं. सत्य कि ओर

परावाणी : Aravind Pandey: ने कहा…

सर्वं खल्विदं ब्रह्म..
दिव्य भाव ..शुभ-विचार विस्तार के लिए धन्यवाद भाई

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

नमस्कार केवलराम जी ।
उस दिन आपसे फ़ोन पर बात करके काफ़ी अच्छा लगा । लेकिन
कई काल्स आ जाने से आपका नम्बर सेव नहीं कर पाया । इसलिये
कृपया आज शाम 3 बजे से 6 बजे के बीच बात कर लें । धन्यवाद ।

Dr Varsha Singh ने कहा…

इक तूं ही निरंकार....

IT'S TRUTH. बहुत ही सुन्दर एवं सार्थक लेखन.
बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

मदन शर्मा ने कहा…

ईश्वर इस सृष्टि के कण - कण में समाया है .....सारे जगत का कर्ता धर्ता यह परमात्मा है .
अत्यंत सुन्दर अभिलेख प्रस्तुत किया है आपने.
बहुत बहुत बधाई.

मदन शर्मा ने कहा…

ईश्वर इस सृष्टि के कण - कण में समाया है .....सारे जगत का कर्ता धर्ता यह परमात्मा है .
अत्यंत सुन्दर अभिलेख प्रस्तुत किया है आपने.
बहुत बहुत बधाई.

मुसाफिर क्या बेईमान ने कहा…

हर पल, हर षण जीवन मे बदलाव है. इसे महसूस कीजिये, तो पाएंगे इक उमंग,
इक तरंग, नहीं महसूस करेंगे तो लगेगा स्थूल सा ये जीवन. विधि विधाता
गोड, अल्लाह, भगवान, रचेयता, को महसूस करेंगे तो पाएंगे इक उमंग, इक तरंग,
हर पल, हर षण. आपके ऊपर है, इसे मानेंगे तो ठीक, वर्ना हम तो इसी पथ के यात्री है,
झूठ क्या कहेंगे. सोचिये --------मुसाफिर क्या बेईमान-----

shikha varshney ने कहा…

एकदम सही बात ..ईश्वर तो सर्वव्यापी है.
सार्थक सुन्दर लेखन.

डॉ. दलसिंगार यादव ने कहा…

धर्म और ईश्वर की व्याख्या तो अनंत है। हरि अनंत हरि कथा अनंता। फिर भी आपने सच्ची भावना से यह प्रयास किया है। बधाई।

cmpershad ने कहा…

सब अपनेआप होता रहता है .... पर इस अपनेआप के होने में भी जो शक्ति लगती है वो कहां से आती है... वह ऊर्जा क्या है....???

जीवन का उद्देश ने कहा…

केवल राम जी, आप का बहुत बहुत धन्यवाद कि आप ने मुझे एक ज्ञान दिया और आप और आप के लेख से परिचय हुआ। अति सुन्दर लेख
परन्तु मेरा प्रश्न यह है कि क्या राम जी,कृष्ण जी के समय के मानव इन महापुरूषों की पूजा करते थे ?
ईश्वर की खोज हमारे सब से महत्वपूर्ण कामों में से एक कार्य होना चाहिये। सत्य को स्वीकार करना ही हमारी सफलता का राज़ है। हम सब को हम सब का मालिक. हम सब का रचनाकर्ता सही मार्ग दिखाये। यही मेरी प्रथना है।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

ishwar tu sarv-vyapak hai..:)

anupama's sukrity ! ने कहा…

bahut sateek baat .Ishwar to sarvavyapi hai hi.

सारा सच ने कहा…

मेरी लड़ाई Corruption के खिलाफ है आपके साथ के बिना अधूरी है आप सभी मेरे ब्लॉग को follow करके और follow कराके मेरी मिम्मत बढ़ाये, और मेरा साथ दे ..

Vijai Mathur ने कहा…

आप सब को नव संवत एवं नवरात्रि पर्व की मंगलकामनाएं.

JHAROKHA ने कहा…

kewal ji
aaj ke yug me vigyan chahe jitna bhi tarakki kar le par vah bhi ishwar ki marji ke aage fail ho jaata hai .kyon ki karwane wala to sarv -shakti mmaan kewal ek ishwar hi hai aur ham sab matr madhyam hai .ham jo kuchh bhi karte hain vo uski marji se hi hota hai .hamare -aapke haath me kuchh bhi nahi hai.
dharm se ot-prot aapki yah prastuti waqai bahut bahut hi achhi lagi .
dhanyvaad
poonam

मदन शर्मा ने कहा…

बेहतरीन लेख़ ईश्वर सर्व व्यापक है इसकी सत्ता सृष्टि के कण कण में विद्यमान है

मै आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ .
इस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हमारा नव संवत्सर शुरू होता है इस नव संवत्सर पर आप सभी को हार्दिक शुभ कामनाएं.....

सारा सच ने कहा…

nice कृपया comments देकर और follow करके सभी का होसला बदाए..

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

हे अज्ञात विधाता तुझे प्रणाम

वाणी गीत ने कहा…

इंसान लाख उडाता रहे , परमात्मा अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाता ही है ...
सारगर्भित रचना !

आशा ने कहा…

बहुत अच्छी रचना की है |बधाई
आशा

देवेन्द्र ने कहा…

आपे करता पुरखु बिधाता . जिनि आपे आपि उपाइ पछाता . आपे सतिगुरु आपे सेवकु आपे सृष्टि उपाई हे .

जी राम साहब परम सत्य तो यही है। बहुत सुन्दर व आनंदमयी लेख।

देवेन्द्र ने कहा…

आपे करता पुरखु बिधाता . जिनि आपे आपि उपाइ पछाता . आपे सतिगुरु आपे सेवकु आपे सृष्टि उपाई हे .

जी राम साहब परम सत्य तो यही है। बहुत सुन्दर व आनंदमयी लेख।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut sundar aalekh

shilpa mehta ने कहा…

मैं अपने शक्ति के अंश मात्र से इस सारी स्थूल प्रकृति का धारण और पालन पोषण करता हूँ हे अर्जुन"

दर्शन कौर' दर्शी ' ने कहा…

.परमात्मा इस सृष्टि के कण कण में विद्यमान है और इसे सिर्फ गुरु की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है . इसका स्वरूप निराकार है और यह स्वयं बना है सारी सृष्टि इसमें समाई है और यह सृष्टि में समाया है . सारे जगत का कर्ता धर्ता यह परमात्मा है ...

परमात्मा ही अजर हें अमर हैं...और हमारे सारे कर्मो का संचालक भी ?

gohost ने कहा…

If you done a great job. I enjoyed to read this blog.

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Rahul Paliwal ने कहा…

You seems to be a very enthusiastic and religious person, Kewal..

Loved the way you are putting efforts..

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

बेहतरीन शब्द।

shilpa mehta ने कहा…

वह निराकार भी है, साकार भी |
वह समाया भी है, नहीं भी |
वह उसी व्यक्ति की समझ में और उतना ही आ सकता है - जिसे और जितना वह स्वयं समझा दे | उससे एक कण अधिक नहीं, उससे एक कण कम नहीं |
उसको समझने की कोशिश भी बेमानी लगती है मुझे, सिर्फ प्रेम करती हूँ, और उस पर छोड़ा है कि वह कितना स्वरुप मुझे दिखा दे , क्योंकि उसके पूर्ण स्वरुप के दर्शन तो दिव्य दृष्टि वाला अर्जुन भी न कर पाया ..... संजय भी न कर पाया ...

NISHA MAHARANA ने कहा…

vastav me god is almighty.